Ashfaq Ahmad
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एआई अब भविष्य नहीं: भारत के रोज़मर्रा के जीवन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विस्तार

 


भारत के रोज़मर्रा के जीवन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विस्तार

कुछ वर्ष पहले तक कृत्रिम बुद्धिमत्ता ऐसी तकनीक लगती थी जिसका संबंध मुख्यतः शोध प्रयोगशालाओं, बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों और विज्ञान-कथा की दुनिया से था। अब वह दूरी काफी हद तक समाप्त हो चुकी है। अक्टूबर 2026 तक एआई केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं रह गया है कि वह कुछ सेकंड में लेख लिख सकता है, चित्र बना सकता है या किसी प्रश्न का उत्तर दे सकता है; उसकी वास्तविक अहमियत इस बात में है कि वह धीरे-धीरे उन सामान्य कामकाजी प्रणालियों का हिस्सा बन रहा है जिनके माध्यम से लोग पढ़ते हैं, काम करते हैं, रचनात्मक काम करते हैं और अपना कारोबार चलाते हैं।

एआई में आया सबसे बड़ा बदलाव शायद यही है कि वह अब अपने अलग अस्तित्व का प्रदर्शन करने के बजाय सामान्य कार्यप्रणाली में घुलने लगा है। कोई विद्यार्थी किसी कठिन विषय को समझने के लिए उसकी मदद लेता है, कोई दुकानदार अपने उत्पाद के लिए विज्ञापन तैयार करवाता है, कोई शिक्षक पाठ सामग्री व्यवस्थित करता है, कोई लेखक प्रारंभिक शोध में सहायता लेता है और कोई कर्मचारी लंबे दस्तावेज़ को समझने या सूचनाओं को व्यवस्थित करने के लिए एआई का उपयोग करता है। तकनीक जितनी उपयोगी होती जा रही है, उतनी ही कम दिखाई दे रही है।

प्रयोग से वास्तविक उपयोग तक

भारत में कंपनियों के बीच एआई का उपयोग अब केवल प्रयोग के स्तर पर नहीं है। डेलॉइट की 2026 की एआई संबंधी रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय उद्यमों में सर्वेक्षण के 40 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने एआई के महत्वपूर्ण या पूर्ण उपयोग की जानकारी दी, जबकि वैश्विक औसत लगभग 28 प्रतिशत था। उत्पाद विकास, रणनीति और संचालन, विपणन तथा बिक्री और आपूर्ति श्रृंखला जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर एआई का उपयोग विशेष रूप से दिखाई दिया। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत की 40 प्रतिशत कंपनियाँ पूरी तरह एआई आधारित हो चुकी हैं, बल्कि यह है कि अनेक संगठन इसे प्रयोगशाला की तकनीक के बजाय वास्तविक कारोबारी साधन की तरह देखने लगे हैं।

छोटे कारोबारों में यह बदलाव एक समान गति से नहीं हुआ है, लेकिन दिशा स्पष्ट है। अब किसी व्यापारी या छोटे उद्यमी के सामने सवाल केवल यह नहीं है कि एआई उपलब्ध है या नहीं, बल्कि यह है कि वह उसके काम में वास्तविक रूप से कितना समय बचा सकता है, ग्राहक सेवा को कितना बेहतर कर सकता है और उन कामों को कितना आसान बना सकता है जिनके लिए पहले किसी बाहरी विशेषज्ञ या अतिरिक्त कर्मचारी की आवश्यकता पड़ती थी। एआई का सबसे उपयोगी रूप अक्सर वही होता है जो दिखाई कम देता है और रोज़मर्रा के काम का एक घंटा चुपचाप बचा देता है।

रोज़मर्रा का नया डिजिटल सहायक

पारंपरिक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करने के लिए व्यक्ति को उसके इंटरफेस और कार्यप्रणाली को समझना पड़ता था। एआई ने इस संबंध को काफी हद तक बदल दिया है। अब उपयोगकर्ता कई बार यह बताए बिना कि किसी सॉफ्टवेयर में कौन-सा विकल्प कहाँ है, केवल अपनी आवश्यकता सामान्य भाषा में बता सकता है और एआई उस निर्देश को काम में बदलने की कोशिश करता है।

भारत जैसे भाषाई रूप से विविध देश में यह परिवर्तन विशेष महत्व रखता है। यदि तकनीक का उपयोग केवल अंग्रेज़ी में दक्ष लोगों के लिए आसान रहे, तो उसका लाभ सीमित रहेगा। इसी कारण भारतीय भाषाओं में एआई की क्षमता बढ़ाना केवल भाषाई सुविधा का प्रश्न नहीं, बल्कि तकनीकी पहुँच का प्रश्न भी है। गूगल ने 2026 में भारतीय विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए अनेक एआई सुविधाओं को भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने की दिशा में विस्तार किया है, जबकि इंडिया एआई मिशन शोधकर्ताओं, स्टार्टअप और अन्य संस्थानों के लिए साझा कंप्यूटिंग और डाटा संसाधनों की व्यवस्था विकसित कर रहा है।

अब इसके आगे एक और परिवर्तन दिखाई दे रहा है, जिसे एजेंटिक एआई कहा जा रहा है। पहले एआई मुख्यतः प्रश्न का उत्तर देता था; अब ऐसे एआई एजेंट विकसित किए जा रहे हैं जो निर्देश मिलने के बाद कई चरणों में काम कर सकते हैं और अलग-अलग डिजिटल सेवाओं के साथ काम कर सकते हैं। 2026 में गूगल ने भारत में जेमिनी स्पार्क जैसे व्यक्तिगत एआई एजेंट का विस्तार किया, जबकि भारतीय कंपनियाँ ग्राहक सेवा, विनिर्माण, वित्तीय सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में एआई एजेंट का प्रयोग कर रही हैं। सॉफ्टवेयर का उत्तर देने वाले उपकरण से आगे बढ़कर काम करने वाले सहायक में बदलना आने वाले वर्षों के महत्वपूर्ण परिवर्तनों में से एक हो सकता है।

शिक्षा में एआई की सबसे बड़ी परीक्षा

शिक्षा वह क्षेत्र है जहाँ एआई की उपयोगिता और उसकी सीमाएँ दोनों सबसे स्पष्ट दिखाई देती हैं। विद्यार्थी कठिन विषय समझने, पुनरावृत्ति करने, कोडिंग सीखने, शोध सामग्री व्यवस्थित करने और भाषाई अभ्यास के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। यदि एआई किसी विद्यार्थी को उस बात को दूसरे तरीके से समझा देता है जिसे वह कक्षा में नहीं समझ पाया, तो यह सीखने की प्रक्रिया को मजबूत कर सकता है।

भारत इस दिशा में एआई आधारित शिक्षा का एक महत्वपूर्ण प्रयोग क्षेत्र बन चुका है। जनवरी 2026 में गूगल ने बताया कि सीखने के लिए प्रतिदिन जेमिनी का उपयोग करने वाले देशों में भारत सबसे आगे है। भारतीय उपयोगकर्ताओं ने केवल एक महीने में नोटबुकएलएम के माध्यम से 30 लाख से अधिक सामग्री तैयार की थी। विद्यार्थियों के लिए अध्ययन मार्गदर्शिका, प्रश्नोत्तरी और जेईई मेन की अभ्यास परीक्षाओं जैसी सुविधाएँ भी उपलब्ध कराई गई हैं, जबकि शिक्षकों को एआई का जिम्मेदार उपयोग सिखाने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम बढ़ाए जा रहे हैं।

फिर भी शिक्षा का मूल प्रश्न बना हुआ है। यदि विद्यार्थी एआई से किसी कठिन अवधारणा को समझता है, तो वह उसके सीखने में सहायता कर सकता है; लेकिन यदि वही विद्यार्थी पूरा उत्तर तैयार करवाकर बिना समझे जमा कर देता है, तो तकनीक सीखने की प्रक्रिया को कमजोर भी कर सकती है। इसलिए असली अंतर एआई के अच्छा या बुरा होने में नहीं है। अंतर इस बात में है कि विद्यार्थी मशीन का उपयोग अपनी समझ विकसित करने के लिए करता है या अपनी बौद्धिक मेहनत से बचने के लिए।

रचनात्मकता के सामने नई चुनौती

लेखन, चित्र, वीडियो, डिजाइन और डिजिटल मीडिया उन क्षेत्रों में हैं जहाँ जनरेटिव एआई का प्रभाव सबसे जल्दी दिखाई दिया है। कोई स्वतंत्र रचनाकार कुछ ही समय में प्रारंभिक चित्र बना सकता है, किसी विचार को दृश्य रूप दे सकता है, उपशीर्षक तैयार कर सकता है, ऑडियो साफ कर सकता है, अनुवाद कर सकता है या किसी रचना के कई प्रारंभिक रूप तैयार करके उनमें से उपयुक्त विकल्प चुन सकता है।

छोटे रचनाकारों के लिए यह परिवर्तन वास्तविक अवसर भी है। जो काम पहले किसी डिजाइनर, अनुवादक, संपादक या उत्पादन सहायक की जरूरत पैदा करते थे, उनमें से कई अब एक व्यक्ति अपने स्तर पर कर सकता है। यूट्यूब ने भी भारत में रचनाकारों के लिए एआई से जुड़ी नई क्षमताएँ विकसित करने पर काम शुरू किया है और भारतीय रचनात्मक प्रौद्योगिकी संस्थान के साथ मिलकर एनीमेशन, दृश्य प्रभाव, गेमिंग, विस्तारित वास्तविकता और एआई आधारित रचनात्मक काम के क्षेत्र में प्रशिक्षण को बढ़ावा दिया है।

लेकिन इससे मौलिकता और स्वामित्व का प्रश्न समाप्त नहीं हुआ है; वह और कठिन हो गया है। यदि विचार मनुष्य का है, निर्देश मनुष्य देता है, मशीन दर्जनों विकल्प तैयार करती है और अंतिम रचना मनुष्य चुनकर संपादित करता है, तो उस रचना में मशीन और मनुष्य के योगदान की सीमा कहाँ निर्धारित होगी? कॉपीराइट, प्रशिक्षण डाटा, अनुमति, मौलिकता और रचना के स्वामित्व से जुड़े प्रश्न अब केवल बड़ी तकनीकी कंपनियों और कानून विशेषज्ञों तक सीमित नहीं हैं। लेखकों, कलाकारों और स्वतंत्र रचनाकारों को भी इनके बारे में सोचना पड़ रहा है।

कार्यस्थल बदल रहा है, लेकिन चुपचाप

भविष्य का कार्यालय शायद इस तरह नहीं बदलेगा कि एक दिन अचानक बड़ी संख्या में मनुष्य अपनी जगह मशीनों को सौंप दें। वास्तविक परिवर्तन इससे कहीं धीमा और जटिल होगा। कुछ काम समाप्त होंगे, कुछ काम बहुत तेजी से होने लगेंगे, कुछ नए काम पैदा होंगे और कई मौजूदा नौकरियों में मनुष्य की भूमिका बदल जाएगी।

एआई आज सामान्य पत्राचार तैयार करने, लंबे दस्तावेज़ों का सार निकालने, सूचनाओं का विश्लेषण करने, सॉफ्टवेयर विकास में सहायता करने और ग्राहक सेवा जैसे कामों में इस्तेमाल हो रहा है। भारतीय कंपनियाँ भी प्रयोग के चरण से आगे बढ़कर एआई को वास्तविक उत्पादन प्रणालियों में शामिल कर रही हैं, हालांकि बड़े स्तर पर इसे लागू करना अभी भी आसान नहीं है। डाटा की गुणवत्ता, सुरक्षा, पुराने सॉफ्टवेयर और जवाबदेही जैसे प्रश्न कंपनियों के सामने गंभीर चुनौतियाँ बने हुए हैं।

इसलिए रोजगार पर एआई के प्रभाव को केवल इस सवाल से समझना पर्याप्त नहीं होगा कि कितनी नौकरियाँ समाप्त होंगी। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कौन-से काम बदलेंगे और क्या उन कामों से जुड़े लोगों को नई आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षण मिल सकेगा। भारत के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश की बड़ी डिजिटल सेवा अर्थव्यवस्था लंबे समय से ऐसे कामों पर भी निर्भर रही है जिनमें दोहराव वाली प्रक्रियाओं की भूमिका अधिक रही है।

भारत अपना एआई आधार तैयार कर रहा है

भारत की एआई कहानी में सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन शायद कोई एक चैटबॉट या एआई अनुप्रयोग नहीं, बल्कि उसके पीछे तैयार हो रहा तकनीकी आधार है। इंडिया एआई मिशन के लिए पाँच वर्षों में 10,300 करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान किया गया है और जून 2026 तक साझा कंप्यूटिंग क्षमता 45,000 से अधिक जीपीयू तक पहुँच चुकी थी। अगस्त 2026 तक 237 परियोजनाएँ सब्सिडी वाली एआई कंप्यूटिंग का उपयोग कर चुकी थीं और कुल उपयोग 93 लाख से अधिक जीपीयू घंटों तक पहुँच गया था।

इसका महत्व इसलिए है क्योंकि उच्च क्षमता वाली कंप्यूटिंग लंबे समय तक बड़ी तकनीकी कंपनियों और सीमित संसाधनों वाले शोध संस्थानों के बीच एक बड़ी दूरी रही है। एआईकोश के माध्यम से डाटा सेट, मॉडल, टूलकिट और उपयोग के उदाहरण उपलब्ध कराने की कोशिश भी इसी दिशा का हिस्सा है। यदि यह ढाँचा अपेक्षित रूप से विकसित होता है, तो भारत केवल दूसरे देशों में बने एआई उत्पादों का बड़ा बाजार नहीं रहेगा; उसके पास भारतीय भाषाओं, संस्थाओं और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप एआई तैयार करने की अपनी क्षमता भी मजबूत होगी।

भारतीय भाषाएँ केवल सुविधा नहीं हैं

भारत का एआई भविष्य केवल अंग्रेज़ी के आधार पर नहीं बनाया जा सकता। जिस देश में करोड़ों लोग अपनी शिक्षा, कारोबार और रोज़मर्रा का संवाद भारतीय भाषाओं में करते हैं, वहाँ ऐसी तकनीक की वास्तविक उपयोगिता तभी बढ़ेगी जब वह इन भाषाओं को समझ सके और उनके स्वाभाविक प्रयोग के साथ काम कर सके।

इसीलिए भारतीय भाषाओं पर केंद्रित एआई का विकास अब तकनीकी महत्व का विषय बन चुका है। 2026 के इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में भारतीय कंपनियों द्वारा विकसित स्वदेशी एआई मॉडल प्रस्तुत किए गए और इंडिया एआई मिशन ने भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप फाउंडेशन मॉडल तैयार करने की दिशा में काम आगे बढ़ाया। गूगल ने भी अपने एआई आधारित अध्ययन उपकरणों को अनेक भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराया है। यह केवल सुविधा का विस्तार नहीं है; भाषा यह तय कर सकती है कि कोई तकनीक समाज के कितने बड़े हिस्से तक वास्तव में पहुँच पाएगी।

भरोसे का प्रश्न

एआई जितना अधिक उपयोगी होता जाएगा, उसकी गलतियों का महत्व भी उतना ही बढ़ेगा। किसी प्रयोगात्मक चैटबॉट का गलत उत्तर मनोरंजक हो सकता है, लेकिन वित्तीय सेवा, स्वास्थ्य, शिक्षा या सरकारी व्यवस्था में गलत जानकारी का प्रभाव गंभीर हो सकता है।

भारत में एआई शासन की चर्चा इसी कारण अब सामान्य चेतावनियों से आगे बढ़ चुकी है। 2026 में सरकार ने एआई गवर्नेंस एंड इकोनॉमिक ग्रुप का गठन किया, ताकि एआई से संबंधित नीतियों और उनके समन्वय के लिए एक संस्थागत व्यवस्था बनाई जा सके। टेक्नोलॉजी एंड पॉलिसी एक्सपर्ट कमेटी का गठन भी किया गया और इंडिया एआई मिशन के अंतर्गत सुरक्षित एवं विश्वसनीय एआई के लिए अलग व्यवस्था विकसित की जा रही है।

पुराने समय की तरह केवल किसी प्रस्तावित कानून की प्रतीक्षा करना अब इस क्षेत्र की पूरी तस्वीर नहीं है। भारत में डिजिटल व्यक्तिगत डाटा संरक्षण नियम 2025 मौजूद हैं और एआई शासन संबंधी दिशानिर्देशों में भरोसा, मानव-केंद्रित विकास, निष्पक्षता, जवाबदेही, सुरक्षा और पारदर्शिता जैसे सिद्धांत शामिल हैं। डीपफेक और कृत्रिम रूप से तैयार की गई सामग्री भी बड़ी चिंता बन चुकी है, क्योंकि जब आवाज़, तस्वीर और वीडियो को विश्वसनीय ढंग से बदला जा सकता है, तब सामान्य व्यक्ति के लिए वास्तविक और कृत्रिम सामग्री के बीच अंतर करना कठिन हो जाता है।

एआई हमारे लिए क्या तय नहीं कर सकता

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बारे में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न शायद यह नहीं है कि मशीन कितनी बुद्धिमान हो सकती है। असली प्रश्न यह है कि मनुष्य अपने निर्णयों और जिम्मेदारियों का कितना हिस्सा मशीन को सौंपना चाहता है।

कुछ काम ऐसे हैं जिन्हें एआई को सौंपना स्वाभाविक है। लंबे दस्तावेज़ का सार तैयार करना, सूचनाओं को व्यवस्थित करना, किसी प्रारंभिक मसौदे की जाँच करना या किसी विचार के अलग-अलग रूप सुझाना समय बचा सकता है और मनुष्य के निर्णय को समाप्त नहीं करता। लेकिन कुछ कामों में निर्णय ही सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। शिक्षक को विद्यार्थी की कठिनाई समझनी होती है, चिकित्सक को रोगी की परिस्थिति देखनी होती है, संपादक को यह तय करना होता है कि कोई तर्क वास्तव में महत्वपूर्ण है या नहीं और लेखक को यह तय करना होता है कि उसके पास कहने के लिए क्या है।

एआई के बेहतर होने के साथ यह अंतर और महत्वपूर्ण होगा। जब उत्तर, चित्र, अनुच्छेद या कोड तैयार करना बहुत आसान हो जाएगा, तब यह तय करने की मानवीय क्षमता अधिक मूल्यवान होगी कि तैयार की गई चीज सही है या नहीं, उपयुक्त है या नहीं और वास्तव में आवश्यक भी है या नहीं।

भारत की एआई यात्रा अब कठिन दौर में प्रवेश कर रही है

एआई के उभार का पहला चरण संभावना का था। दूसरा चरण उपयोगिता का है। अब भारत उस अधिक कठिन चरण में प्रवेश कर रहा है जहाँ इस तकनीक को वास्तविक आर्थिक मूल्य पैदा करना होगा, शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं को बेहतर बनाना होगा और व्यापक समाज तक उसका लाभ पहुँचाना होगा, बिना नई असमानताएँ और नई निर्भरताएँ पैदा किए।

भारत के पास इस दिशा में कई मजबूत आधार हैं— बड़ी तकनीकी कार्यशक्ति, विशाल घरेलू बाजार, डिजिटल सार्वजनिक ढाँचा, तेजी से बढ़ता स्टार्टअप क्षेत्र और डिजिटल सेवाओं को बड़े पैमाने पर अपनाने वाली आबादी। लेकिन एआई तक पहुँच अभी समान नहीं है, डाटा की गुणवत्ता एक गंभीर समस्या बनी हुई है, उच्च क्षमता वाली कंप्यूटिंग संसाधन महँगे हैं और एआई के प्रभावी उपयोग के लिए आवश्यक कौशल भी समाज में समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए चुनौती केवल यह नहीं है कि एआई को हर जगह पहुँचा दिया जाए, बल्कि यह है कि उसका लाभ उन लोगों तक भी पहुँचे जो पहले से तकनीकी रूप से सक्षम और संसाधन-संपन्न नहीं हैं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब भविष्य की कोई दूर की संभावना नहीं है। अक्टूबर 2026 में भारत के लिए प्रश्न यह नहीं रह गया है कि एआई का इस्तेमाल होगा या नहीं; वह पहले से हो रहा है। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि भारत उसके साथ कैसा संबंध बनाएगा— क्या एआई केवल अधिक तेजी से सामग्री बनाने और अधिक काम पूरा करने का साधन बनेगा, या वह ऐसी तकनीक बन सकेगा जो लोगों को बेहतर सीखने, बेहतर काम करने, अधिक स्वतंत्र रूप से सृजन करने और वास्तविक समस्याओं को अधिक समझदारी से हल करने में सहायता दे।

—Ashfaq Ahmad

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